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Grameen Mahilayoon Ke Dharmik Visvas Avam Sanskritik Kriyakalap

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Rs. 175.00
ISBN:
8170992605
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0.00 KGS
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About the Book

परम्परागत रूप से भारतीय नारी सांस्कृतिक एंब धार्मिक जीवन का एक अभिन्न अंग है। जीवन पथ के प्रत्येक महत्वपूर्ण संस्कार एवं कर्मकाण्डों में उसकी सहभागिता अनिवार्य रही है। वस्तुतः परम्परागत धार्मिक विश्वासों, मूल्यों एवं कर्मकाण्डों के स्थायित्व एवं निरत्तरता में भारतीय नारी की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण रही है। वर्तमान इध्ययन की समस्या ग्रामीण महिलाओं के धार्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन, क्रियाकलाप एवं विश्वासों के माध्यम से यह ज्ञात करना है कि ग्रामीण महिलाएं किस मात्रा में परम्परागत जीवन शैली और व्यवहार के तरीकों को बनाए हुए है और किस मात्रा में वे आधुनिक जीवन शैली और व्यवहार के तरीकों की ओर उत्मुख हो रही है। शिक्षा, सूचना सम्प्रेषण, एवं सहभागिता को आधार मानकर वर्तमान अध्ययन यह ज्ञात करने का प्रयास करता है कि ग्रामीण महिलाओं की पुरातन एवं नवीन पीढ़ी के धार्मिक एवं सांस्कृतिक विश्वास, मूल्य एवं क्रियाओं में किस मात्रा में अन्तर उत्पन्न हो रहा है? ग्रामीण धर्म एवं संस्कृति दो विभिन्न सांस्कृतिक परम्परांओं- वृहद एवं लघु परम्परा का सम्मिश्रण है। एक ओर ग्रामीण धर्म देवी-देवता, संस्कार, आराधना एवं विश्वास पद्धति, परिष्कृत एवं शास्त्राीय हिन्दु धर्म का प्रतिनिधित्व करता है तथा दूसरी ओर ग्रामीण धर्म में लोक संस्कृति की परम्पराएं, विश्वास, कर्मकाण्ड, देवी-देवता आदि का समावेश है। वर्तमान अध्ययन ग्रामीण महिलाओं के धार्मिक एवं सांस्कृतिक मुल्यों, विश्वासों एवं क्रियाओं के अध्यन के माध्यम से यह भी ज्ञात करने का प्रयास करता है कि ग्रामीण धर्म एवं संस्कृति किस मात्रा में वृहद हिन्दू संस्कृति एवं स्थानीय लोक संस्कृति की विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करता है। अध्ययन का उाद्धेश्य ग्रामीण धर्म एवं संस्कृति के माध्यम से हिन्दू जीवनदर्शन, धर्म एवं संस्कृति की व्यापकता, समग्रता एवं मौलिक एकता का अन्वेषण करना है। प्रस्तुत ग्रन्थ में ग्रामीण महिलाओं का निम्न के संदर्भ में अध्ययन किया गया हैः - धार्मिक विश्वास एवं ग्रामीण परम्रपाएॅ धार्मिक संस्कार एवं ग्रामीण रीति रिवाज धार्मिक व्रत, त्यौहार एवं मेला इस प्रकार प्रस्तुत ग्रन्थ समाज विज्ञान के अध्येताओं, महिला कल्याण एवं विकास कार्यक्रमों से जुड़े नीति निर्धारकों, कार्यकत्र्ताओं, भारतीय ग्रामीण संस्कृति के शोधार्थियों के अतिरिक्त अन्य सामान्य पागकगण के लिए भी विशेष उपयोगी सिद्ध होगा।

 

डा. श्रीमती मीना शुक्ला जन्म 1953, एम.ए. समाजशास्त्रा, अर्थशास्त्रा एवं संस्कृत ने काशी हिन्दू विश्वजिद्यालय से गृहविज्ञान में पी-एच.डी. की उपाधि अर्जित की। सम्प्रति वे महिला कालेज, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के गृहविज्ञान विभाग में व्याख्याता है। उनके कई शोध पत्रा प्रतिष्टित पत्रा पत्रिकाआंे में प्रकाशित हो चुके है। उनकी पुस्तक समाज शास्त्रा के मूल तत्व स्नातक स्तर के लिए पाठ्य पुस्तक है। डा. श्रीमती शुक्ला उ.प्र. की दो समाजशास्त्रा संगठनों की सदस्या भी है।


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