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Bhaiya Bhagavatidasa aur unaka sahitya

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Rs. 200.00
ISBN:
8170994098
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About the Book

भारत में ब्रहांण तथा श्रमण संस्कृति की धाराएं समानान्तर रूप से प्रवाहित रही हैं। खेद का विषय है कि हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखक तथा विद्वान सामप्रदायिक कर कर जैन साहित्य की काफी समय ती उपेक्षा करते रहे। किन्तु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने शेध ग्रंथ हिन्दी साहित्य का सादिकाल में जोरदार शब्दों में इसकी महत्ता को स्वीकार करते हुउ लिखा ‘‘केवल नैतिक और धार्मिक या आध्यात्मिक अपउेशों को देखकर यदि हम ग्रंथांें को साहित्य सीमा से बाहर निकालने लगेंगंे तो हमें आदिकाव्य से भी हाथ धोना पडेगा, कबीर की रचनाओं को भी नमस्कार कर देना पडंेगा और जायसी को भी दूर से दंडवत करके विदा कर देना पडेगा।’’ भैया भगवतीदास सत्रहवी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में एक आध्यात्मिक जैन संत और भक्त कवि हुए है। उनके अंतर से ज्ञान, भक्ति और काव्य की पुथुल धारा प्रवाहित होती रही। काव्य सृजन के समय के अनुसार वे हिन्दी साहित्य में रीतिकाल के अंतर्गत् आते हैं, अलकारों के प्रयोग तथा चित्रकाव्य में उन पर रीतिकालीन प्रभाव परिलक्षित भी होता है किन्तु मनः प्रवृत्ति से हम उन्हें संत और भक्त कवियों के ही निकठ पाते है। आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने हिन्दी साहित्य के रीतिकालीन कवियों को तीन वर्गों में विभाजित किया है रीलिसिद्ध, रीतिबद्ध और रीतिमुक्त कवि इस दृष्टि से भैया भगवतीदास का स्थान रीतिमुक्त कवियों में निर्धारित होता है, किन्तु ऐसा करने से उनके प्रति पूर्ण न्याय नहीं होगा। रीतिमुक्त कवियों में तो घनानन्द, ठाकुर, बौधा भी है, क्या भैया भ्गवतीदास को इसी कोठि का कवि माना जा सकता है? कदापि नहीं। आवश्यकता इस बात की है कि हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने वाले नये लेखक ’’रीतिकाल के भक्त और संत कवि’’ नाम का एक पृथक वर्ग बनाएं, जिसमें ब्रहंा में विलास कराने वाले काव्य के रचयिताओं को समासीन किया जा सके। ‘भैया भगवतीदास और उनका साहित्य’ अनेक दृष्टिओं से अप्रतिम है। इसमें एक विस्मृतप्राय कवि एंव भक्त की कीर्तिरक्षा का स्तुत्य प्रयास किया गया है।


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